सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हिमाचल प्रदेश के नए मुख्यमंत्री और मुकेश अग्निहोत्री ने उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सचिन पायलट, राजीव शुक्ला समेत पार्टी के कई दिग्ग्ज नेता शामिल हुए।
मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री के नामों को लेकर पिछले दो दिनों में खूब सियासत हुई। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की पत्नी और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह के नाम की सबसे आगे थीं, लेकिन अंत में सुखविंदर सिंह सुक्खू बाजी मार ले गए।
इसके बाद चर्चा शुरू हुई कि प्रतिभा सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह को उप-मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। ऐसा करके प्रतिभा सिंह के खेमे को शांत करने की अटकलें थीं, लेकिन ऐन वक्त पूरा पासा ही पलट गया। उप-मुख्यमंत्री की दौड़ से भी वीरभद्र सिंह का परिवार बाहर हो गया। विक्रमादित्य की जगह कांग्रेस विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रहे मुकेश अग्निहोत्री के नाम का एलान हो गया।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जिन वीरभद्र सिंह के नाम पर कांग्रेस ने खूब चुनाव प्रसार किया, उनके परिवार में से किसी को मुख्यमंत्री या उप-मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया? क्या कारण थे कि आखिरी समय में प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह दौड़ से भी बाहर हो गए
क्यों दौड़ से बाहर हुए प्रतिभा और विक्रमादित्य सिंह?
इसे समझने के लिए हमने हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण गोपाल ठाकुर से बात की। उन्होंने कहा, ‘प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री न बनाना काफी हद तक लोगों को समझ में आता है, लेकिन विक्रमादित्य का नाम डिप्टी सीएम से भी बाहर होना एक बड़ा सियासी संदेश है। इसके कई मायने निकाले जा सकते हैं।’
1. उपचुनाव नहीं चाहती पार्टी: कांग्रेस हाईकमान किसी भी हालत में अभी उपचुनाव नहीं चाहती है। सुखविंदर सिंह सुक्खू विधायक चुने जा चुके हैं, जबकि प्रतिभा सिंह अभी सांसद हैं। अगर प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जाता, तो कांग्रेस को दो उपचुनाव कराने पड़ते। पहला विधानसभा और दूसरा मंडी लोकसभा सीट पर। इस बार हिमाचल प्रदेश में हुए चुनाव में मंडी लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाली 17 में से 12 विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत हुई है। मतलब अगर उपचुनाव होते तो कांग्रेस को ये सीट हारने का डर था। वहीं, विधानसभा के अन्य सीटों पर भी जो जीत मिली है, वो बहुत कम मार्जिन से मिली है। ऐसे में उपचुनाव में भी हार का डर था।
2. परिवारवाद के आरोपों को खारिज करना चाहती है पार्टी: कांग्रेस पर हमेशा से परिवारवाद का आरोप लगता रहा है। प्रतिभा सिंह के पति वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बेटे भी विधायक हैं और खुद प्रतिभा सिंह सांसद हैं। ऐसे में अगर प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री या विक्रमादित्य को उप मुख्यमंत्री बनाया जाता तो एक बार फिर से कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता।
3. मंडी में मिली हार: कांग्रेस ने हिमाचल के चार में से तीन लोकसभा क्षेत्रों में पड़ने वाली विधानसभाओं में बेहतर प्रदर्शन किया। वह भी तब जब इन तीनों लोकसभा पर भाजपा का कब्जा है। लेकिन जहां से कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह सांसद हैं, वहां काफी खराब रिजल्ट गया। मंडी लोकसभा की 17 में से 12 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को हार मिली।
4. वरिष्ठ नेताओं ने किया विक्रमादित्य की दावेदारी का विरोध: प्रतिभा के मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर होने के बाद उपमुख्यमंत्री की दौड़ में विक्रमादित्य का नाम आया। विक्रमादित्य की दावेदारी का कांग्रेस के कई वरिष्ठ विधायकों ने विरोध किया। वहीं, दौड़ में विक्रमादित्य के साथ पांच बार के विधायक मुकेश अग्निहोत्री का भी नाम था। आलाकमान दो डिप्टी सीएम बनाने को तैयार नहीं था। इसके चलते विक्रमादित्य दौड़ में पिछड़ गए।
5. पार्टी में फूट पड़ने का डर था : कांग्रेस को सबसे बड़ा डर ये था कि अगर विक्रमादित्य सिंह को उप-मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा तो आने वाले समय में पार्टी के अंदर फूट पड़ सकती है। सामान्य बैकग्राउंड से आने वाले सुखविंदर सिंह सुक्खू और मुकेश अग्निहोत्री को ही मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री बनाकर यह सियासी संदेश देने की कोशिश हुई कि पार्टी में आम कार्यकर्ताओं को आगे तक बढ़ने का मौका दिया जाता है।
प्रतिभा के समर्थकों का प्रदर्शन भी पड़ा भारी
चुनाव जीतने के बाद जिस तरह से प्रतिभा सिंह के समर्थक लगातार उनके पक्ष में प्रदर्शन कर रहे थे। इसका नुकसान भी प्रतिभा और विक्रमादित्य सिंह को उठाना पड़ा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इसे गलत माना। ऐसे में हाईकमान ने वीरभद्र सिंह के करीबी रहे मुकेश अग्निहोत्री को चुना। जिसका प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह भी विरोध नहीं कर पाए।
कौन हैं मुकेश अग्निहोत्री, जिन्हें डिप्टी सीएम बनाया गया?
मुकेश अग्निहोत्री का जन्म पंजाब के संगरूर में नौ अक्तूबर 1962 को हुआ। पिता का नाम ओंकार चंद शर्मा है। मुकेश की प्रारंभिक शिक्षा ऊना में ही हुई। इसके बाद उन्होंने गणित से एमएससी की डिग्री ली। पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा इन पब्लिक रिलेशन करके पत्रकार बन गए। राजनीति में आने से पहले मुकेश अग्निहोत्री ने शिमला में 10 साल तक और दिल्ली में चार साल तक पत्रकारिता की थी। मुकेश पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बेहद करीबी रहे हैं। अग्निहोत्री को राजनीतिक विरासत परिवार से मिली है। उनके पिता ओंकार चंद शर्मा ने 1998 में ऊना जिला की संतोषगढ़ सीट से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था।
मुकेश अग्निहोत्री राज्य में एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे के तौर पर जाने जाते हैं। कांग्रेस ने मुकेश को डिप्टी सीएम की कमान सौंपकर ब्राह्मण समुदाय को साधने की कोशिश की है। अग्निहोत्री ने इस साल हरोली विधानसभा सीट से चुनाव में जीत हासिल की है। पिछले पांच साल वह हिमाचल प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। इसके पहले अग्निहोत्री हारोली विधानसभा सीट से 2003, 2007, 2012 और 2017 में चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने 2012 से 2017 के दौरान कांग्रेस की सरकार में उद्योग मंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी। इसके अलावा वो संसदीय कार्य, सूचना एवं जनसंपर्क और श्रम एवं रोजगार विभाग की भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।


