सवाल कौन है स्टिंगबाज़ ?

स्टिंगबाज़ अपराध, खोज़ी एवं जांच पड़ताल पर आधारित एक सोशल मीडिया न्यूज़ प्लेटफार्म है. स्टिंगबाज़ की स्थापना हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से 2015 में हुई। जिसका मुख्य लक्ष्य उस सच को सामने लाना था जिसे आज का मैनस्ट्रीम मीडिया लाने से बचता रहा या फिर ला नहीं सका।

स्टिंगबाज़ ने जनहित में कई सनसनीखेज़ खुलासे किए जिसमें मानव तस्करी पर ऑपरेशन कलयुग, ऑपरेशन जिस्म, नशा माफियाओं को बेपर्दा करता ऑपरेशन डी कंपनी, ऑपरेशन एक्सपोज्ड, ऑपरेशन मास्टर माइंड, घरेलू हिंसा कानून के गलत इस्तेमाल पर ऑपरेशन दगाबाज़, बड़े भ्रष्टाचार को बेनकाब करता ऑपरेशन एमसी के अलावा कई खुलासे कर चुका है।

आप सबके सहयोग और भरोसा के साथ अभी भी स्टिंगबाज़ की अंडरकवर टीम कई अंडरकवर मिशन में लगी हुई है। वर्तमान में स्टिंगबाज़ का संचालन हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब से हो रहा है

सवाल कौन है स्टिंगबाज़ के संस्थापक ?

स्टिंगबाज़ हिमाचल प्रदेश के एकमात्र खोज़ी एवं खुफिया पत्रकार संजीव शर्मा के सोच की उपज है, 18 सालों से मीडिया में अपनी सेवा देने वाले संजीव शर्मा देश के कई न्यूज़ चैनल में स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम हैड यानी एसआईटी हैड रह चुके है। चंडीगढ़, पटियाला, देहरादून, शिमला, दिल्ली और नोयडा में कई न्यूज़ चैनल के अंदर न्यूज़ एंकर, न्यूज़ प्रोडूसर, प्रोग्रामिंग हेड के पद पर अपनी कुशल सेवा देने के बाद अब अपनी जन्मभूमि को ही कर्मभूमि बनाने में लगे हुए है। स्वतंत्र एवं ख़ोज़ी पत्रकारिता को जिंदा रखने के मकसद से स्टिंगबाज़ का अवतार हुआ है।

सवाल कैसे हुई स्टिंगबाज़ की स्थापना ?

हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में एक महिला द्वारा सैक्स रैकेट का संचालन लंबे समय से किया जा रहा था महिला के जाल में कई नाबालिग लड़किया भी फंस चुकी थी इस नेटवर्क के तार कांगड़ के हर शहर तक थे,

जिसमें कई बड़े चेहरों की भागेदारी भी दर्ज थी। अपनी एक महीने की लंबी जांच के बाद एक स्टिंग ऑपरेशन ऑपरेशन जिस्म नाम से जारी किया गया जिसे जारी करने के लिए स्टिंगबाज़ नाम प्लेटफर्म बिना किसी तरह की कारपोरेट मदद के तैयार किया गया।

आखिर स्टिंगबाज़ को क्यों चाहिए आपसे आर्थिक सहयोग और मदद

कड़वा है लेकिन सच है आज के समय में मीडिया घराना या समुह या तो विज्ञापन से चलता है या फिर किसी का गुलाम या जुबान बनने से, यहां तक की आपको सत्ता की गोद में भी बैठना पड़ सकता है।

जाहीर है जो आपको विज्ञापन देगा वो बदले में आपसे कुछ तो चाहेगा, हो सकता है कीमत सच का गला घोटने की चुकानी पड़े, ये भी हो सकता है कि विज्ञापन के बदले इतनी पीआर ब्रांडिंग करनी पड़े कि आपको सच और किसी की महिमामंडल में कोई फर्क नज़र ना आए।

आपके सहयोग और विश्वास के बिना हमारा ये कारवां आधा और अधुरा है आज के इस दौर में खोजी पत्रकारिता और कठिन हो चुकी है। अगर आप सच को ना केवल जिंदा बल्कि मजबूत रखना चाहते है ?

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