ये कहानी है उस इंसान की जिसे जब बचपन का सही मतलब तक पता नहीं था, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया और कंधों पर दो छोटे भाई और माता जी की जिम्मेवारी आई गई। अपनों घर से बाहर कर दिया, बड़े भाई ने एक पिता होने की जिम्मेवारी निभाई पढ़ाई की मजदूरी तक की, अपने दोनों भाई का पढ़ाया यहीं नहीं एक इंटरव्यू में जसविंद्र सिंह कहते है उन्होंने सिर्फ इसलिए गटर तक साफ किया ताकि उन पैसों से वो अपनी बीवी का ईलाज तक करवा सके
अपनों ने ही छीन ली बेटी की सांसे
कामा भाई उस पल को याद करके भावुक हो जाते है जब कभी उनकी सबसे लाड़ली बेटी का जिक्र होता है, दरअसल उनकी बेटी अचानक बीमार हो गई ईलाज के लिए जेब में पैसे नहीं उस वक्त कामा मजदूरी का काम करते थे, गांव में कोई सरकारी काम होना था कामा इस काम को कम रूपये में करने के लिए भी तैयार थे,
जिंदगी और मौत की जंग लड़ती बेटी की दुआई भी उन्होंने दी, लेकिन अपने ही रिश्तेदारों ने काम देने से मना कर दिया, एक बेटी ने पिता की गोद में तडफ तडफ कर जान दे दी, क्योकि उन्हें समय रहते मजदूरी नहीं मिला और बेटी को ईलाज, आज कामा कई परिवार को गोद ले चुके है। कई का साहरा बन चुके है, मकसद बस एक कोई भूखा या फिर बिना ईलाज मौत का निवाला ना बने।
एक मजदूर से लम्बू क्रैन सर्विस तक आसान नहीं था ये सफर
कभी मजदेूर तो कभी मैकेनिक, कभी ट्रक ड्राइवर कामा भाई के संघर्ष की कहानी काफी लंबी है, उन्हें शब्दों में बांधना बेहद मुश्किल है, कभी एक एक निवाले के लिए तरसने वाले स्वाभिमानी जसविंद्र सिंह कामा आज लंबू क्रैन सर्विस नाम बनाने में कामयाब रहे आज उनके बेडे में एक दर्जन से ज्यदा लाखों, करोड़ों की मशीने उनके स्ट्रगल की कहानी बयान करती है। तीनों भाई का खाना आज भी एक चुल्हें में बनता है, तीना भाई आज भी एक ही घर में रहते है
एक मेला एक पेंट और तीनो भाई
पांवटा साहिब में होली का मेला होता है जिसमें लोग जाते है, मां बाप अपने बच्चों को नये कपड़े दिलाते है लेकिन कामा भाई भले ही आज दूसरों के लिए फरिश्ते बने हुए हो उनकी जिंदगी में कोई फरिश्ता बन कर नहीं आया कामा बताते है है वो तीनों भाई मेला देखने जाते थे लेेकिन बारी बारी बारी एक भाई पहले नई पेंट पहन कर जाता था उसके वापिस आने तक दूसरा भाई इंतज़ार करता था फिर ऐसे ही तीना भाई एक ही पेट को बारी बारी पहनते थे।
आटा की चक्की वाले ने बगाया, अनाज से निकले कीड़े और
कामा आज कई घरो तक आनाज पहुंचाते है इसके पीछे वजह उन्हें वो दिन आज भी याद है, घर में खाने के लिए आनाज का एक दाना तक नहीं था, तभी वो आटा चक्की वाले के पास जाते है उन्हें वहा से खदेड़ा जाता है, लेकिन बार बार गुजारिश करने बाद आनाज वाला कुछ आटा देता है जिसमें कीड़े पड़े हुए थे और उसे एक आटा चक्की का स्पयेर पार्ट भी था, तब से उन्होंने सोचा कामा तेरा भी वक्त आएगा, बस यहीं से शुरूआत हुई मजबूर लोगों को राशन देने की।


